आधुनिक सावन- इंदिरा कुमारी


सावन बरसे ना बरसे, 

समय नहीं सुमिरने का, 

पैसा धुंध डूबा गई सबको, 

रास्ता नहीं उबरने का। 


घटा छाई, बिजली कड़की,

अवकाश मिले न देखने का, 

जब आतिशबाजी बिजली चमके,

तमाशा बने दिखाने का,


चला कागज नाव न बच्चे बहले,

यह मतलबहीन बहाने का, 

बना वीडियो गेम,खेल वैज्ञानिक, 

तरीका हौसला बढ़ाने का। 


बच्चे ,बूढ़े, पुरुष, महिला, 

है सबको बाहर जाने का, 

मतलब नहीं एक दूजे से, 

मकसद पैसा कमाने का। 


लुप्त हुआ शब्द विरह विरहिणी, 

बाट जोहे जो सावन का, 

भाव भावना सो गए दोनों, 

मौसम किस मनभावन का। 


अब इस तपिश से प्यासी इन्दिरा,

गाये गीत कजरी सावन का, 

बदरा बरस वो भाव जगा दे, 

संग सजनी व साजन का।

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